हे पछुआ पवन तुम्हे सुरति पूरब की आई
यादों को तजा करने की देता तुम्हे बधाई
थी लगती कभी मुझे थी पूरब की हवाए प्यारी
पर इस पश्चिम की धुन ने सूखी कर दी फुलवारी
आ लौट चले फिर पूरब ,पश्चिम की चौंध छुड़ा ली
ऋषि मुनियों की धरती की सींचे फिर फुलवारी
आपके स्नेह से अभिभूत हूँ
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