रविवार, 19 दिसंबर 2010

अब भी बुलबुल गाती है , अब भी मीना हंसती है
नज़रों को जरा सहेजे अब भी  वो रुत आती है
मत रुत को बदनाम करो वो तो आती जाती है
आती है खुशी लाती है जाती  गम दे जाती है
ये गम और ख़ुशी एक दूजे के पूरक है
एक दूजे से हाथ मिलाये एक दूजे के पीछे है
मै कैसे कहूं किसी को कुछ , जब नियति ही है मतवाली
शत्रु की दुआ जहरीली ,मित्रो की रसीली गाली 

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