वो दिन न रहा ये भी न रहेगा
कल बीत गया आज भी गुजर जायेगा
न गाने कितने जन्म बीत गए हमारे
युगों की बात अब कौन दोहराएगा
विश्वाश करो नियंता पर सबकुछ है नियंत्रित
दुःख का हर आलम सुख में बदल जायेगा
सुख दुःख रात दिन गर्मी सर्दी
कभी प्रकृत का दुलराना कभी बेदर्दी
ये सब है उस नियंता के खेल
ये भाई इसी को जिंदगी समझ
चाहे आह भरकर या प्रेम से :झेल .झेल .झेल
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें