जब मिला ना कोई सहज भाव भ्रम को ही अपना मान लिया
माना कि ,क ; है कहकर सभी प्रश्नों को हल किया
पर हाय नियति की चाले वह उत्तर ही फिर प्रश्न बना
फिर माना भ्रम क है , फिर से उत्तर को निकाल लिया
पर ये क्या फिर से वही हल , प्रश्न बनकर हुआ खड़ा
मै हल करता वह प्रश्न बनता ,बस यही सिलसिला सुरू हुआ
हूँ लगा इसी में आजतलक वह प्रश्न नहीं हुआ पूरा
लगता है इस जनम में इस भ्रम का हल रहेगा,
अधूरा ....बस अधूरा .....
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